Kargil (May–July 1999)

उनसे क्या पुछोगे जिनके घरो में सन्नाटा छाया है,
उनसे भी क्या जो, हर घड़ी अख़बारो की सुर्ख़ियों में,
बुरी खबरों में अच्छाई ढूंढते हैं,
हाँ, आज किसी पन्ने पर नहीं आया मेरे किसी का नाम

यहीं कुछ दूर उनके घर से मातम का जुलूस निकला,
हमसे चार घर छोढ़ के ही तो है वो घर
जो उजड़ गया किसी क जुनून को हवा देने में
पड़ोसी के टेलिफोन से, अब मौत का ही संदेश आता है

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Ek Nadi

यह ज़मीन जो कभी भीघी हुई थी,
उनके खून में सनी हुई थी|
एक नदी बहती थी यहाँ, सब कुछ साथ ले गयी,
कपकपति करहों को पीछे छोढ़ गयी|

अब वैसी नहीं, ज़मीन सख़्त सी है थोड़ी,
हरी घास उपर तक आ गयी है|
अब ओस की बूदों पर सूरज चमकता है,
ज़मीन को आसमान छूने का भ्रम सा होता है|

दौर है, आज है, तो कल नहीं,
कल से बेहतर है, इसीमें खुश है|
ज़रूरी नहीं की कल जो आअएगा इससे अच्छा हो|
नदी तो अब भी बहती है, यहाँ नहीं कहीं ओर ही सही|

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That Girl…

We expect so much from life…it never rains but pours..sometime our expectations lead us down…with every new relationship…there is a new start..a new expectation…an euphoria…and euphoria never lasts longer..what last is nothing bt the disappointment of that urge to be perfect..in a perfect relationship..with a perfect person…n who is perfect..and that quest to find that euphoric world begins….
Is it that complicated or m complicating it further…u like someone for a long time…u hv been wanting to be with him for ever..u dont want any emotional involvement…u just want to be with him…be it to deceit smone…for that very moment…i want to be selfish…live for myself..that diversion from my life will not impact me…just for a while…let me go there…i ll come back here….to this disappointment…let me live with this euphoria for some more time…let me be…myself. Dont overburden me with ur expectations….let me be…this me…

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Khwaab

ख्वाब की तासीर कैसे बयान करूँ,
कहना ना भी चाहूं  तो क्या
कम्बख़्त लॅब्ज़ ही  तो है,
अंज़ाम तक आते आते बहक जाते है

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Sailaab

सब था तित्र-बित्र, कहीं दबा
एक साथ आ गया सामने
रोकना तो बहुत चाहा खुद को
पर सैलाब था, सब बहा के ले गया

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Sawaal Jawaab

वो वक़्त भी क्या वक़्त था
सवालों का छज्जा जवाबों से मिलता
हर मोढ़ पर एक ऑर सवाल इंतज़ार करता
जवाबों में ऑर सवाल ढूंढता

आस पास हो रहे फेर बदल ने
परत दर परत चढ़े अबोध ने
हरप्पा मोहेनजोदरो की सभ्यता की तरह
सवाल कहीं गहराई में दफ़ना दिए

जेबों में भरे सवालों को
किसी जेबकतरे ने चुरा लिया
जहाँ सवालों पर जवाबों की छूट थी
उस दुकान को क्यों बंद कर दिया

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Influence

वो सुकून-ए-दिल के लिए कुछ तो करूँ
नज़र जो मिले तो फिर सलाम करूँ
मुझे तो होश नहीं आप मशवरा दिजियी
कहाँ से छेड़ूँ फसाना कहाँ तमाम करूँ

वो कैफियत ऐसी है तुम्हारी की सोचता हूँ
लब्जों में कैसे बयान करूँ
बहुतसी यादें, बहुत सी तक़रीरें बबस्ता है
कभी खुद से वक़्त मिले तो फिर सवाल करू

फिसलती हुई ज़मीं में ये दाग-बूटे लगाये है
जिनकी शादाबी दूर दूर तक फैल रही है
यहाँ की महक हवाओं में महसूस होती है
बहमो-गुमान नहीं मेरा
फ़िज़ा की सरगोशियों में फिर से बहार आई है

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